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Showing posts from October, 2020

चपाती और सेकूं क्या?

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  नीता राजस्थान के मारवाड़ प्रांत से है जहाँ मान-मनुहार कुछ ज्यादा ही की जाती है. उसकी शादी जब बड़े शहर में तय हुई तो उसे बहुत फ़िक्र हो रही थी कि वहाँ के तौर-तरीके कैसे होंगे? मैं एडजस्ट कर पाऊँगी या नहीं?? जब उसके ससुराल वाले रोका करने आये तो उनका शानदार स्वागत हुआ. बहुत सारी मिठाइयाँ, स्वादिष्ट सब्जियाँ और पकवान बहुत आग्रह करके परोसे गये. सबने लड़की वालों की खातिरदारी की तारीफ की. बारात का स्वागत भी बहुत ही बढ़िया हुआ. जब नीता विदा होकर ससुराल पहुँची तो कमलाजी उसे बार-बार खाने-पीने के लिए ही पूछती रहती. नीता खुश हुई, “वाह! मेरी सासू माँ तो कितनी मनुहार करती है. एक ही चीज के लिए दस बार पूछती है. लेकिन पाँच दिन बाद जब उसके दोनों छोटे भाई पगफेरे की रस्म के लिए लेने आये तो उसे समझ आया कि इस मनुहार के पीछे भाव ये है कि अगला मना कर दे. क्योंकि वे बार-बार खाते समय आकर पूछ जाती, “चपाती और सेकूं क्या??” फिर एकबार उसके चाचा उसी के ससुराल की ओर कोई शादी अटेंड करने आये. लंच का समय था तो वो डाइनिंग पर खाना परोसने लगी तभी कमला जी ने कहा, “जब समधीजी शादी में आये हैं तो खाना भी वहीँ खायेंगे. अगर य...

अब झूठन खाना बंद

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  “राम-राम! अन्न का ऐसा अपमान इस घर में पिछले चालीस सालों में नहीं हुआ. सीमा, रमा! तुम्हें शर्म नहीं आती खाना बाहर गाय-कुत्तों को खिलाते हुए जबकि तुम दोनों खुद उसे खा सकती थी.” सावित्री जी ने दोनों बहुओं को जोर से डांटा. “पर मम्मीजी वो खाना झूठा था. दोनों भाइयों ने अपनी प्लेट में छोड़ दिया था. शास्त्रों के अनुसार झूठा खाना नहीं खाना चाहिये.” सीमा ने सपाट कह दिया. “अब आप गुस्सा छोड़िये और गरमागरम खाना खाइये.” रमा ने बात सँभालने की कोशिश की. “आजतक कभी खाया है मैंने अपने पति के खाने से पहले. तुम्हारे पापाजी को खिलाओ. मेरे लिए अलग प्लेट की कोई जरूरत नहीं. पति का बचा खाने वाली औरत सीधी स्वर्ग जाती है. मेरी सास ने मुझे यही सिखाया.” “फिर तो सभी बुजुर्ग औरतें चाहे जितना पाप करें स्वर्ग जायेगी और आजकल की बहुएँ घोर नरक में जायेगी. ये भी अच्छा इंसाफ है.” सीमा ने फिर कहा. “हमने कभी मुँह नहीं खोला अपनी सास के आगे और ये कल की आई मुझसे बहस कर रही है.” “मम्मीजी आपकी शादी 12 साल की उम्र में हुई थी सो जैसा दादीजी कहती गई, आप करते गए. लेकिन हम लोग की शादी 26वें साल में हुई है. हम हर बात में...

आत्मबल

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काश! इक बार तू उस चोले से निकल आता, काश! तू खुदमुख़्तार-सा इक इन्सान हो पाता, मुझे तेरे कठपुतलियों-से नाचने पर ऐतराज है, मेरा आत्मबल तेरी नजर में ना अह्मों-खास है, मैं तेरी लहर से दूर, इक सशक्त नदी बन गई, बनकर पिछलग्गू, तेरी तो हस्ती ही मिट गई, फिर भी उस भुलावे की दुनिया में तू खुश है, इसलिए ख्याल आया, क्या तू मेरे काबिल है? तू अमरबेल-सा परजीवी, पनप न पाया, मैंने मंजिल के लिए अकेले कदम उठाया, न तू सहारा बन पाया न ही आत्मदीप, फिर भी चाहता है मैं वार दूं अपनी प्रीत, मुझे तेरा यूँ शासित होना रास न आया, साथ रहा पर तू दिल में न उतर पाया.